
आज विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर यह कहना गर्व की बात है कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, संवेदना और सामाजिक चेतना की जीवंत पहचान है। हिंदी हमारी मातृभाषा है, जिसमें हम सोचते हैं, महसूस करते हैं और अपने भावों को सबसे सहज रूप में अभिव्यक्त करते हैं।
हिंदी ने हमें जोड़ने का काम किया है—गांव से शहर तक, आमजन से सत्ता तक, साहित्य से पत्रकारिता तक। यह भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता की मजबूत डोर है। वैश्वीकरण के इस दौर में जब विदेशी भाषाओं का प्रभाव बढ़ रहा है, तब हिंदी का संरक्षण और सम्मान करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी बन जाती है।
आज हिंदी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है। संयुक्त राष्ट्र से लेकर डिजिटल मीडिया तक, हिंदी का विस्तार यह साबित करता है कि यह भाषा समय के साथ चलने वाली, जीवंत और सशक्त है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी दैनिक जीवनशैली, शिक्षा, प्रशासन और मीडिया में हिंदी के प्रयोग को और अधिक प्रोत्साहित करें।
एक पत्रकार के रूप में मेरा यह मानना है कि हिंदी जन-जन की आवाज़ है। यही भाषा समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की पीड़ा और उम्मीदों को सबसे प्रभावी ढंग से सामने लाती है। हिंदी का सम्मान करना, दरअसल अपने समाज और अपनी जड़ों का सम्मान करना है।
विश्व हिंदी दिवस पर आइए, हम संकल्प लें कि
हिंदी को केवल बोलेंगे ही नहीं, बल्कि जीएंगे भी।
हिंदी को गर्व बनाएंगे, और आने वाली पीढ़ियों तक इसकी गरिमा पहुंचाएंगे।
— अरुण शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार
उपाध्यक्ष, दिल्ली प्रदेश
नेशनल जर्नलिस्ट एसोसिएशन
